“एक दिन था, सोचता था, जाऊंगा मैं नभ के पार,
थे स्वप्न आँखों में संजोए स्वयं पर किया था ऐतबार,
पंखों को फैलाकरके अपने, उड़ना शुरू जैसे किया,
एक झोंका आया जोर का मैं लड़खड़ा नीचे गिरा,
था सोचता देगा सहारा कोई तो, समझेगा इस बात को,
इस बार ना उड़ सका, पर उडूँगा मैं एक दिन,
पर भ्रम था ये जो टूटकर टुकड़े हुआ,
जब अपनों ने नजरें चुरा लीं और कहा कुछ इस तरह,
तुम हो घमंडी जानते कुछ भी नहीं,
दूसरो से सीखने की चाह हो रखते नहीं,
सीमाएँ हैं संसार में हर ओर ही फैली हुई,
यदि तुम नहीं चाहते समझना, तब तो तुम आजाद हो,
जो मन में आये वो करो,
फिर से उड़ो और फिर गिरो,
थे शब्द मेरे गम हुए, आँखें रोयी बस बार बार,
हृदय में बसने वाले ही करने लगे उस पर प्रहार,
करता मैं भी कब तक रुदन, उठ करके में खड़ा हुआ,
पुव्निर्मित लीक पर संसार की चलने लगा,
कल्पना के नभ को मैंने भूलना शुरू किया,
एक हताशा मन में लेकर आगे में बढता चला,
आस पास देखा तो सब संलग्न थे , प्रस्सन थे,
पर आत्मा थी मेरी जो हताश थी निराश थी,
कह रही थी मुझसे क्यों कर रहे हो वह सभी,
जिससे तुम्हें होता कभी था कष्ट अपार,
अनसुना सा करता रहता उस ध्वनि को बार बार,
किन्तु कब तक चल सकूँगा साथ मैं इस बोझ के,
पर दिलासा देता स्वयं को, कि एक दिन वो आयेगा,
प्राणों का ये पंछी पिंजर छोड़कर उड़ जायेगा,
होंगी ना सीमाएँ कहीं, होगा ना बंधन कोई,
फिर उडूँगा मैं भी नभ में, पंखों को अपने पसार,
फिर उडूँगा मैं भी नभ में, पंखों को अपने पसार !!
Vani Bhardwaj
Bachelor of Science (I) – Santosh Medical College